B-Day Of City Varanasi- बनारस के लिए आज का दिन है खास 'वाराणसी' को मिली आधिकारिक मान्यता

शहर बनारस का नाम अपने आप में ख़ास और अलग है दरसअल ये हमारी अल्हड़ बनारस अपनी बेफ़िक्री और फक्कड़पन के लिए दुनियाभर में मशहूर है. कहते है और लोगो का ऐसा विश्वास भी है कि अगर व्यक्ति की मौत शिव की नगरी काशी में हो जाए तो व्यक्ति को मरने पर मोक्ष मिलता है. लेकिन यार ये शहर बनारस लोगो के खाली पन को भर देता है बनारस लोगो को जीना सिखाता है ना की मरना सिखाता है|

B-Day Of City Varanasi- बनारस के लिए आज का दिन है खास 'वाराणसी' को मिली आधिकारिक मान्यता

शहर बनारस का नाम अपने आप में ख़ास और अलग है दरसअल ये हमारी अल्हड़ बनारस अपनी बेफ़िक्री और फक्कड़पन के लिए दुनियाभर में मशहूर है. कहते है और लोगो का ऐसा विश्वास भी है कि अगर व्यक्ति की मौत शिव की नगरी काशी में हो जाए तो व्यक्ति को मरने पर मोक्ष मिलता है. लेकिन यार ये शहर बनारस लोगो के खाली पन को भर देता है बनारस लोगो को जीना सिखाता है ना की मरना सिखाता है| बनारस की चर्चा सिर्फ भारत में नहीं विदेशों में भी होती है | यहाँ का सकूँन लोगो को आकर्षित कर के यहाँ खींच ही लाता है  इसीलिए लोग कहते है घूमने के शौकीन हैं और ज़िंदगी जीना चाहते है, तो बनारस ज़रूर आएं.  और ये हमारा भी य़कीन है कि यहां आने के बाद, आपका यहां से जाने का मन नहीं करेगा, क्योंकि लोग बनारस घूमते नहीं जीते हैं. यहाँ के घाट लोगो को एक अलग ऊर्जा देती है |आप माने या ना माने लेकिन कुछ तो इस शहर में बात जो अपने नाम से ही लोगो को अपनी ओर खींच लेता है और ये शहर लोगो को इतना रास आता है कि जो यहाँ एक बार आता है उनका मन हमेशा के लिए इस शहर के ही हो जाते हैं आज बनारस  यानी वाराणसी का जन्मदिवस है . 24 मई, 1956 को प्रशासनिक तौर पर इसका सर्वमान्‍‍‍य नाम वाराणसी के तौर पर स्वीकार किया गया था|

 



वैसे बनारस को अनेको नाम से जाना जाता है लोग इसे काशी ,भोले की नगरी , यही नहीं आप को ये जान कर सायद हैरानी होगी की वाराणसी के एक दो नहीं करीब 18 नाम है जी आप बिल्कुल सही सुन रहे है वाराणसी को अविमुक्त, आनंदवन, रुद्रवास के नाम भी जाना जाता रहा है। वाराणसी, काशी, फो लो - नाइ (फाह्यान द्वारा प्रदत्‍त नाम), पो लो - निसेस (ह्वेनसांग द्वारा प्रदत्‍त नाम), बनारस (मुस्लिमों द्वारा प्रयुक्‍त), बेनारस, अविमुक्त, आनन्दवन, रुद्रवास, महाश्मशान, जित्वरी, सुदर्शन, ब्रह्मवर्धन, रामनगर, मालिनी, पुष्पावती, आनंद कानन और मोहम्मदाबाद आदि नाम भी है लेकिन इनमे से ज्यादातर नाम अब कही गुम हो गए है है की  पुरातन काल में लोगों की जुबान पर  ये नाम रहा करता था |

वाराणसी का वास्तविक इतिहास शायद इतिहास के पन्नों से भी अधिक प्राचीन है। यह विश्व के प्राचीन नगरों में से एक है। अगर हम बात करे अपने प्राचीनतम पुराणों की तो पुराणों के अनुसार मनु से 11वीं पीढ़ी के राजा काश के नाम पर काशी बसी। 24 मई को गजट के अनुसार वाराणसी अपना 65वां जन्मदिन जा रही दरसअल  24 मई, 1956 को प्रशासनिक तौर पर इसका सर्वमान्‍‍‍य नाम वाराणसी के तौर पर स्वीकार किया गया था। वैसे तो बनारस जिले की पहचान से जुड़ी वरुणा व अस्सी नदियों के सम्मिलित रूप से लिया गया और आधिकारिक रूप से दस्तावेजों में दर्ज किया गया। आधिकारिक रूप से इस नाम को सरकारी रूप से डा. संपूर्णानंद ने मान्यता दिलाई। यह जानकारी वाराणसी गजेटियर में बतौर दस्तावेज दर्ज है। हालांकि अपनी भाषा  बोलचाल की भाषामें लोग वाराणसी को काशी और बनारस आज भी कहते है

एक बात और वैसे तो हिन्दू धर्म मे वाराणसी शहर पवित्र शहरो में से एक है ये बात सबको मालुम है लेकि सायद ये नहीं मालुम होगा की  बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। वही बात कर ले बनारस की संस्कृति का तो यहाँ की  संस्कृति का गंगा नदी, श्री कशी विश्वनाथ मन्दिर एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है| इसलिए वाराणसी को  ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ जैसे नामो से जाना जाता है| और कितनी तारीफ़ करे इस बनारस की यहाँ   भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं।

 



गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था।  कहते है हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा  हुवा और यही विकसित हुआ है। बनारस ही एकमात्र ऐसी जगह है, जहां ये नदी उल्टी दिशा में यानि दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है.
अब ये नहीं मालुम गंगा नदी के किनारे बनारस को बसना था, या इस नदी को बनारस के किनारे बहना था, मालूम करना आसान नहीं है.
वैसे तो आप को वाराणसी में 84 घाटों का जिक्र मिल जाएगा और कहते है हर घाट की यहाँ पर अपनी कहानी है यहाँ के महत्वपूर्ण घाटों में दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, मर्णिकणिका घाट, हरिश्चन्द्र घाट, केदार घाट, अहिल्याबाई घाट, आदिकेशव घाट, और भी घाट आते है
लेकिन दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती की बात ही कुछ अलग है | या कह सकते है बनारस अपने तमाम खूबियों की वजह से ही बहुत ख़ास है |