Shaheed Diwas : भगत सिंह की शहादत और आज का दौर

भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव यह नाम किसी परिचय के मोहताज नहीं है, ना ही इनका नाम और इनके काम किसी से छुपे हैं । देश को स्वतंत्र कराने और अंग्रेजों के गुलामी से आजादी दिलाने में इन तीनों का नाम देश का हर एक नागरिक बड़े ही गर्व से लेता है। 1947 से पहले न किसी के अंदर एक धर्म को लेकर मतभेद हुआ करता था , और न कोई एक समुदाय को लेकर नफरत की भावना फैलाया करता था ।

Shaheed Diwas : भगत सिंह की शहादत और आज का दौर

भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव यह नाम किसी परिचय के मोहताज नहीं है, ना ही इनका नाम और इनके काम किसी से छुपे हैं । देश को स्वतंत्र कराने और अंग्रेजों के गुलामी से आजादी दिलाने में इन तीनों का नाम देश का हर एक नागरिक बड़े ही गर्व से लेता है। 1947 से पहले न किसी के अंदर एक धर्म को लेकर मतभेद हुआ करता था , और न कोई एक समुदाय को लेकर नफरत की भावना फैलाया करता था । यही कारण था कि हमारा देश अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी से मुक्त हुआ। भले ही आज का समय अलग हो चुका है भले आज लोग एक दूसरे को जात और मजहब से पहचानने लगे हैं , पर आजादी से पहले का माहौल कुछ अलग था तभी कई युवा देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने से अच्छा शहीद होना सही समझते थे।

आज का भारत वर्ष एक बड़ी दयनीय स्थिति में चल रहा है, मानव की दोनों तरफ खाई है और बीच में एक नंगी तार पर इंसान चल रहा है। वो गिरा तो मौत और तार पर ज्यादा देर तक चल नहीं सकता। कहने का तात्पर्य यह है एक धर्म के अनुयाई दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हो गए हैं ।

अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। ये शब्द किसी एक धर्म पर निर्धारित नहीं है , इसमें अब हर एक धर्म के लोग आ चुके हैं चाहे वह हिंदू हो या फिर मुसलमान या फिर सिख या ईसाई।

यह जातिगत मतभेद 2014 के बाद से अधिक बढ़ गया । अलग-अलग विचार की पार्टियां अपने-अपने धर्म को लेकर जनता के सामने धर्म बचाने की मुहिम चलाने लगी , और यही कारण रहा कि 2020 का दंगा बढ़ते भारत को बिगड़ते भारत में तब्दील कर रहा है । भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है , भारत ने दुनिया को सुनय का ज्ञान दिया , तो वही चाणक्य जैसा बुद्धिमान भी दिया कबीर जैसा कवि दिया तो रहीम जैसा भाईचारा का ज्ञान दिया ।

इस सब के बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों के नाम भी लोग फक्र से लेते हैं, भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु इसके बहुत बड़े उदाहरण हैं , जिन्होंने भारत की आजादी का सपना तब देखा जब आज के दौर में युवा मौज मस्ती में अपना समय काट लेते हैं ।

एक कहावत है और बहुत प्रचलित है , 1 साल और 350 दिन जेल में बंद रहने के बावजूद भगत सिंह का वजन लगातार बढ़ता जा रहा था । भगत सिंह का वजन बढ़ने का कारण इतिहासकार बताते हैं भगत सिंह बहुत खुश थे , कि देश के लिए कुर्बान होने जा रहे हैं। लेकिन जब इन्हें फांसी देना तय किया गया था। जेल के सारे कैदी रो रहे थे। इसी दिन भगत सिंह के साथ ही राजगुरु और सुखदेव को भी फांसी होनी थी पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे थे भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को बचाने के लिए लाहौर में भारी भीड़ इकट्ठा हुआ हुई थी। अंग्रेजो को यह बात का अंदेशा था कि बवाल जरूर होगा इसीलिए तय दिन से एक दिन पहले भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई।

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को अविभाजित पंजाब के लायलपुर जो अब पाकिस्तान में है वहां पर भगत सिंह जन्म थे । भगत सिंह बहुत छोटी उम्र से ही आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए और उनकी लोकप्रियता से भयभीत ब्रिटिश हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी पर लटका दिया उनका अंतिम संस्कार सतलज नदी के तट पर किया गया था ।

भगत सिंह अपने कारनामों के कारण युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए। उन्होंने 8 अप्रैल 1929 में को अपने साथियों के साथ इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए केंद्रीय विधानसभा में बम फेंके , सेंट्रल असेंबली में बम विस्फोट करके उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ खुले विद्रोह को बुलंदी प्रदान की। इन्होंने असेंबली में बम फेंक कर भी भागने से मना कर दिया। भगत सिंह करीब 2 साल जेल में रहे अपने विचार व्यक्त करते थे जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन लगातार जारी रहा। लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जो उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे है और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए।

यह विचारधारा भगत सिंह की थी की देश के खातिर एक 23 वर्ष का युवा फांसी पर लटक जाता है। मुस्कुराते हुए ताकि  देश के आने वाले युवा खुशी से स्वतंत्र होकर घूम फिर सके अपना कार्य कर सकें। आज का समय अब बदल चुका है आज अब जातिगत मतभेद को लेकर आने वाले युवा इतने सक्रिय हो गए हैं कि लोगों को नाम से और उसके जाती से पहचानने लगे हैं ।