थप्पड़ फिल्म समीक्षा | तापसी पन्नू | पावेल गुलाटी | दीया मिर्ज़ा | ZNDM NEWS |

अनुभव सिन्हा अपने कायाकल्प के बाद जिस तरह का सिनेमा बना रहे हैं वह वाकई तारीफे काबिल है! उनकी फिल्म ‘थप्पड़’ का शुमार अच्छे सिनेमा में जरूर होगा। मात्र एक विचार है शादीशुदा जिंदगी में कोई पति अपनी पत्नी को किसी भी कारण से किसी भी परिस्थिति में ‘थप्पड़’ मारने का हक नहीं रखता। अमूमन भारतीय समाज में पति अगर अपनी पत्नी को मार दे तो ना सिर्फ उसके सास-ससुर बल्कि लड़की के मां-बाप भी यह कहते नजर आते हैं कि पति पत्नी में थोड़ा बहुत लड़ाई झगड़ा तो चलता रहता है।

अनुभव सिन्हा अपने कायाकल्प के बाद जिस तरह का सिनेमा बना रहे हैं वह वाकई तारीफे काबिल है! उनकी फिल्म ‘थप्पड़’ का शुमार अच्छे सिनेमा में जरूर होगा। मात्र एक विचार है शादीशुदा जिंदगी में कोई पति अपनी पत्नी को किसी भी कारण से किसी भी परिस्थिति में ‘थप्पड़’ मारने का हक नहीं रखता। अमूमन भारतीय समाज में पति अगर अपनी पत्नी को मार दे तो ना सिर्फ उसके सास-ससुर बल्कि लड़की के मां-बाप भी यह कहते नजर आते हैं कि पति पत्नी में थोड़ा बहुत लड़ाई झगड़ा तो चलता रहता है। और ‘थप्पड़’ यह कहती है कि कभी भी थप्पड़ मारना सही नहीं है, इसका अधिकार पति को नहीं है। थप्पड़ मारना न सिर्फ नैतिक रूप से गलत है बल्कि कानून भी गलत है। थप्पड़ अपने समय की बहुत महत्वपूर्ण फिल्म है इसे देखा जाना बहुत जरूरी है। तापसी पन्नू वैसे ही एक समर्थ अभिनेत्री हैं मगर ‘थप्पड़’ में उनका एक अलग ही आयाम सामने आया है अभिनय कि जिन ऊंचाइयों को वह छूती हैं उस उच्च स्तर पर वह अभी तक नहीं गई थीं। उनके पति का किरदार निभा रहे पावेल ने अपनी पहली ही फिल्म से साबित कर दिया वह एक समर्थ कलाकार हैं। किरदार में कई सारी परतें थीं वह एक ऐसे पति का का किरदार निभा रहे हैं जो पॉजिटिव होते हुए भी गलत है और वह कहां गलत है इस बात का एहसास उसे नहीं है। इसे पर्दे पर उतारना वाकई मुश्किल काम था जो पावेल ने पूरी कुशलता से किया है।