Film Review- पंकज त्रिपाठी की फ़िल्म 'कागज़' Zee 5 Premium हुई रिलीज़

जी 5 पर्मियम पर पंकज त्रिपाठी की कागज़ रिलीज़ हो गई है | सतीश कौशिक ने इस फिल्म का निर्देशन किया और सलमान खान इस फिल्म के प्रोड्यूसर है | सतीश कौशिक के निर्देशन में बनी कागज सत्य घटनाओं से प्रेरित है| कहानी लाल बिहारी मृतक की है जिन्होंने अपनी जिंदगी के 19 साल सिर्फ ये साबित करने में निकाल दिए कि वे जिंदा हैं| अब सतीश कौशिक ने काफी हद तक उनकी जिंदगी को अपनी कहानी में पिरोया है|और फिल्म में छोटे छोटे कलाकार है |

Film Review-  पंकज त्रिपाठी की फ़िल्म 'कागज़' Zee 5 Premium हुई रिलीज़

जी 5 पर्मियम पर पंकज त्रिपाठी की कागज़ रिलीज़ हो गई है | सतीश कौशिक ने इस फिल्म का निर्देशन किया और सलमान खान इस फिल्म  के प्रोड्यूसर है | सतीश कौशिक के निर्देशन में बनी कागज सत्य घटनाओं से प्रेरित है. कहानी लाल बिहारी मृतक की है जिन्होंने अपनी जिंदगी के 19 साल सिर्फ ये साबित करने में निकाल दिए कि वे जिंदा हैं| अब सतीश कौशिक ने काफी हद तक उनकी जिंदगी को अपनी कहानी में पिरोया है|और फिल्म में छोटे छोटे कलाकार है | पंकज त्रिपाठी पहली बार लीड रोल में नज़र और उन्होने इस फ़िल्म में अपनी बेहतरीन एक्टिंग से जान फूक दी है | 

तो फिल्म की कहानी कच इस प्रकार है ,उत्तर प्रदेश का निवासी भरत लाल (पंकज त्रिपाठी) खुद का बैंड चलाता है. उसकी धुन सभी का दिल बहलाती है. लेकिन बड़े सपनों को पूरा करने के लिए जनाब कर्जा लेना चाहते हैं| फैसला जरूर भरत लाल की पत्नी का है, लेकिन ये जनाब भी खुशी-खुशी ख्याली पुलाव पका रहे हैं. वे सीधे लेखपाल के पास जाते हैं और अपने हक की जमीन मांगते हैं| (कर्जा लेने के लिए जमीन को बतौर सिक्योरिटी देने की बात हुई है) बस इतना बोलते ही भरत लाल के सारे सपने टूट जाते हैं क्योंकि जमीन मिलना तो दूर उन्हें तो अपनी जिंदगी का वो सच पता चल जाता है जिसकी वजह से 18 साल लंबी एक जंग की तैयानी करनी पड़ती है| 

भरत लाल कानूनी कागजों में कई साल पहले ही मृतक बता दिए गए हैं|  शरीर से जिंदा हैं, लेकिन रिकॉर्ड में वे मर गए हैं. भरत के लिए एक कागज ने ऐसी दुविधा पैदा कर दी है कि उन्हें अब जिंदा होते हुए भी अपने जीवित होने का सबूत देना पड़ रहा है| उत्तर प्रदेश का निवासी भरत लाल (पंकज त्रिपाठी) खुद का बैंड चलाता है. उसकी धुन सभी का दिल बहलाती है. लेकिन बड़े सपनों को पूरा करने के लिए जनाब कर्जा लेना चाहते हैं. फैसला जरूर भरत लाल की पत्नी का है, लेकिन ये जनाब भी खुशी-खुशी ख्याली पुलाव पका रहे हैं. वे सीधे लेखपाल के पास जाते हैं और अपने हक की जमीन मांगते हैं. (कर्जा लेने के लिए जमीन को बतौर सिक्योरिटी देने की बात हुई है) बस इतना बोलते ही भरत लाल के सारे सपने टूट जाते हैं क्योंकि जमीन मिलना तो दूर उन्हें तो अपनी जिंदगी का वो सच पता चल जाता है जिसकी वजह से 18 साल लंबी एक जंग की तैयानी करनी पड़ती है. भरत लाल कानूनी कागजों में कई साल पहले ही मृतक बता दिए गए हैं. शरीर से जिंदा हैं, लेकिन रिकॉर्ड में वे मर गए हैं. भरत के लिए एक कागज ने ऐसी दुविधा पैदा कर दी है कि उन्हें अब जिंदा होते हुए भी अपने जीवित होने का सबूत देना पड़ रहा है.दूसरे हाफ में जरूर कहानी थोड़े हिचकोले खाती है, दिशा से भटकरती है और बोर भी करती है | लेकिन एक फिल्म के तौर पर कहानी 1 घंटा 50 मिनट तक बांधने में कामयाब रही| 
Rating- 3/5 Stars