भारत-चीन सीमा विवाद - चीन पड़ा नरम ,डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता से किया इंकार | India China Border Dispute

बीते कुछ दिनों से भारत और चीन के सीमा विवाद ने गंभीर रूप ले लिया है। हालांकि लगातार चीन की तरफ से बातचीत का प्रयास हुआ है। और चीनी सरकार का रुख भी काफी नरम नज़र आ रहा है.....

भारत-चीन सीमा विवाद - चीन पड़ा नरम ,डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता से किया इंकार | India China Border Dispute
भारत-चीन सीमा विवाद - चीन पड़ा नरम ,डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता से किया इंकार | India China Border Dispute

भारत-चीन सीमा विवाद - चीन पड़ा नरम ,डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता से किया इंकार | India China Border Dispute

इधर भारत ने भी चीन के रुख में आए बदलाव को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  के मध्यस्थता के प्रस्ताव को फिलहाल यह कहकर अस्वीकार कर दिया है कि दोनों देशों में अच्छी बातचीत चल रही है। 


सरकार के सूत्रों पता चला है की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हाल में कोई बातचीत नहीं हुई है. यह स्पष्टीकरण तब आया है जब ट्रंप ने वॉशिंगटन में कहा कि उन्होंने पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ चल रहे भारत के सीमा विवाद को लेकर मोदी से बात की है|  लेकिन PTI  से पता चला की प्रधान मंत्री मोदी और अमेरिकी राष्टपति ट्रंप के बीच आखिरी बातचीत 4 अप्रैल को मलेरिया की दवाई हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के विषय पर हुई थी | 

वही विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत चीन के साथ हालिया सीमा विवाद को हल करने के लिए स्थापित तंत्र और राजनयिक संपर्कों के माध्यम से सीधे तौर पर चीन से बातचीत कर रहा है| इसमें भारत को किसी थर्ड पार्टी की जरूरत नहीं है| चीन के सरकारी मीडिया ने भी गुरूवार को कहा कि चीन और भारत को वर्तमान में सीमा पर जारी गतिरोध को हल करने के लिए अमेरिका की सहायता की जरूरत नहीं है| 

चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से ट्रंप के ट्वीट के जवाब में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आयी है लेकिन सरकारी समाचारपत्र 'ग्लोबल टाइम्स' में छपे एक लेख में कहा गया कि दोनों देशों को राष्ट्रपति ट्रंप की ऐसी सहायता की जरूरत नहीं है. इसमें कहा गया, 'हालिया विवाद को भारत और चीन द्विपक्षीय वार्ता से सुलझाने में सक्षम हैं| दोनों देशो को अमेरिका से सतर्क रहना चाहिए जो कि क्षेत्र में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने के अवसर की तलाश में रहता है |


चीन के रुख बदलने के पीछे उसकी बिगड़ती अर्थव्यवस्था को भी मन जा रहा है 

बीते शुक्रवार को चीन ने कहा कि वह इस साल आर्थिक वृद्धि के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं कर रहा है. साल 1990 के बाद से ऐसा पहली बार हो रहा है जबकि चीन की सरकार ने इकनॉमिक ग्रोथ का टारगेट तय नहीं किया है|  BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक वृद्धि के लक्ष्य तय न करना एक तरह से इस बात की स्वीकारोक्ति है कि कोरोना वायरस महामारी के बाद के दौर में चीन के लिए आर्थिक रिकवरी कितनी मुश्किल होगी| 

इन मुश्किल भरे हालात में बेरोज़गारी के आंकड़े और ज्यादा मुसीबत पैदा करने वाले साबित हो रहे हैं|  मार्च के मुकाबले अप्रैल में बेरोज़गारी की दर मामूली बढ़कर 6 फीसदी पर पहुंच गई है जो कि बेरोज़गारी के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के नज़दीक है| हालांकि ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वास्तविक आंकड़े और ज्यादा बुरे हैं|

थिंक टैंक कैपिटल इकनॉमिक्स ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि करीब 20 फ़ीसदी प्रवासी मजदूर शहरों को वापस नहीं लौटे हैं, ऐसे में बेरोज़गारी का असली आंकड़ा इसका करीब दोगुना तक हो सकता है| पेकिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जस्टिन यूफू लिन मार्च में सिंघुआ यूनिवर्सिटी के एक सर्वे का हवाला देते हुए कहते हैं कि निजी उद्योगों में से करीब 85 फीसदी को अगले तीन महीने खुद को टिकाए रखने का संघर्ष करना होगा. वह कहते हैं, "उद्यमों के दिवालिया होने से बेरोजगारी में इज़ाफ़ा होगा|