Farmers Protest : कौन है राकेश टिकैत जिन्होंने छोड़ दिया था दिल्ली पुलिस की नौकरी और 44 गए है जेल

पिछले दो महीने से दिल्ली की सीमा पर नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन की अगुवाई कर रहे भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत दिल्ली पुलिस में बतौर कॉन्स्टेबल नौकरी कर चुके हैं। 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली की आड़ में हुई हिंसा के बाद आंदोलन को हुए नुकसान की भरपाई टिकैत के आंसुओं ने पूरी की है। टिकैत मीडिया के सामने क्या रोए गाजीपुर बॉर्डर पर एक बार फिर से किसान और युवा छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ी। अपने आंसुओं की दम पर जनसैलाब बुलाने वाले टिकैत आखिर कैसे बने किसान नेता आइए जानते हैं।

Farmers Protest : कौन है राकेश टिकैत  जिन्होंने छोड़ दिया था दिल्ली पुलिस की नौकरी और 44 गए है जेल

पिछले दो महीने से दिल्ली की सीमा पर नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन की अगुवाई कर रहे भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत  दिल्ली पुलिस में बतौर कॉन्स्टेबल नौकरी कर चुके हैं। 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली की आड़ में हुई हिंसा के बाद आंदोलन को हुए नुकसान की भरपाई टिकैत के आंसुओं ने पूरी की है। टिकैत मीडिया के सामने क्या रोए गाजीपुर बॉर्डर पर एक बार फिर से किसान और युवा छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ी। अपने आंसुओं की दम पर जनसैलाब बुलाने वाले टिकैत आखिर कैसे बने किसान नेता आइए जानते हैं।

चौधरी महेंद्र सिंह जिन्हें बाबा की ख्याति प्राप्त है वो राकेश टिकैत के पिता हैं। चौधरी महेंद्र के दूसरे नंबर के बेटे टिकैत का जन्म मुजफ्फरनगर के गांव सिसौली में 4 जून 1969 में हुआ था। उन्होंने मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने लॉ की पढ़ाई की और एलएलबी की डिग्री हालिस की। साल 1992 में राकेश टिकैत दिल्ली पुलिस में बतौर कॉन्स्टेबल नौकरी कर रहे थे। 1993-94 में चौधरी महेंद्र सिंह की अगुवाई में दिल्ली में एक आंदोलन चल रहा था। इसी आंदोलन में शामिल होने के दौरान राकेश टिकैत ने नौकरी छोड़ दी।

44 बार जेल गए टिकैत

पुलिस कॉन्स्टेबल से किसान नेता बने टिकैत को आंदोलन के चक्करों में 44 बार जेल भी जाना पड़ा। समय के साथ राकेश टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के बड़े नेता के रूप में उभरे। उन्होंने लोकसभा और विधानसभा के लिए चुनाव भी लड़ा, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। साल 2007 में मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट से उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और साल 2014 में राष्ट्रीय लोकदल ने उन्हें अमरोहा लोकसभा सीट से चुनाव लड़वाया। दोनो बार ही उनको हार का सामना करना पड़ा।

टिकैत के आंसुओं ने फिर फूंकी आंदोलन में जान
अब नए कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर पिछले दो माह से चल रहे किसान आंदोलन में टिकैत का नाम एक बार फिर गूंजा। टिकैत के नाम पर सैकड़ों ट्रैक्टर और हजारों की तादाद में किसान गाजीपुर आकर धरने पर बैठे हैं। 26 जनवरी को हुई हिंसा के बाद माना जा रहा था कि अब किसान आंदोनल ठंडा पड़ जाएगा, लेकिन मीडिया के सामने जैसे टिकैत रोए और कहा कि वो अपनी लड़ाई जारी रखेंगे तो हजारों की संख्या में किसान एक बार फिर से गाजीपुर बॉर्डर का रुख करने लगे।


आंदोलन को मिल रहा विपक्षियों का भरपूर समर्थन

गाजीपुर में कम लोगों को देखते हुए पश्चिमी यूपी के लोगों से विरोध में भीड़ बढ़ाने के लिए गुरुवार को कॉल और संदेश भेजे गए थे, जिसे उत्तर प्रदेश प्रशासन ने गुरुवार रात तक खाली कराने की उम्मीद की थी। टिकैत के रोने के वीडियो को गाजीपुर में उन लोगों द्वारा व्यापक रूप से साझा किया गया था। जिसके बाद शुक्रवार तक छात्रों से भरी कारें आ गई थीं, जो 'राकेश टिकैत जिंदाबाद' के नारे लगाते हुए प्रदर्शनस्थल पहुंचे।

किसान आंदोलन को शुक्रवार को पूरे दिन के विपक्षियों का समर्थन मिलता रहा। रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी, राजनीतिज्ञ योगेंद्र यादव, कांग्रेस नेता अलका लांबा और अजय सिंह लल्लू जैसे नेता गाजीपुर बॉर्डर पहुंच और आंदोलन को अपना समर्थन दिया। सबसे पहले सुबह रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी राकेश टिकैत से मिले।