चौबेपुर के संतोष सिंह प्रकरण में एनएचआरसी ने डीएम से मांगी रिपोर्ट

वाराणसी के संतोष सिंह संतोष मूरत सिंह, मैं जिंदा हूं के नाम से क्षेत्र में चर्चित हैं और एक बार फिर से संतोष चर्चा में आ चुके है दरसअल जाने माने अभिनेता नाना पाटेकर के रसोइयां रहे संतोष सिंह मृतक के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी)ने एक याचिका की सुनवाई के बाद डीएम से दस्तावेज में जिंदा व्यक्ति को मृत घोषित करने के मामले में रिपोर्ट मांगी है।

चौबेपुर के संतोष सिंह प्रकरण में एनएचआरसी ने डीएम से मांगी रिपोर्ट

वाराणसी के संतोष सिंह संतोष मूरत सिंह, मैं जिंदा हूं के नाम से क्षेत्र में चर्चित हैं और एक बार फिर से संतोष चर्चा में आ चुके है दरसअल जाने माने  अभिनेता नाना पाटेकर के रसोइयां रहे संतोष सिंह मृतक के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी)ने एक याचिका की सुनवाई के बाद डीएम से दस्तावेज में जिंदा व्यक्ति को मृत घोषित करने के मामले में रिपोर्ट मांगी है। इस मामले में जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा का कहना है की  मानवाधिकार आयोग के आदेश के क्रम में उच्च अधिकारियों से इस प्रकरण की जांच कराकर समय से रिपोर्ट प्रेषित कर दी जाएगी। जांच में कोई दोषी मिलेगा तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।

दरसअल थाना चौबेपुर के छितौनी निवासी संतोष सिंह पिछले 18 वर्ष से दस्तावेज में खुद को ज़िंदा दिखाने के लिए संघर्षरत हैं इस बात को लेकर संतोष मूरत ने जिला मुख्यालय से लेकर तहसील तक धरना प्रदर्शन किया गया साथ ही पीएम नरेंद्र मोदी और सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ  तक गुहार लगा चुके हैं। और तो और हाल ही में प्रशासन से नाराज हो कर सरकार से भीख मांगने को लाइसेंस भी मांग रखी है।

वही संतोष मूरत जी का कहना है की दस्तावेज में जिंदा होने के लिए अब तक संघर्ष कर रहा हूं। इसी बाबत बीडीसी के लिए नामांकन पत्र क्रय कर चुका हूं। चुनाव लड़ेंगे। सिर्फ यह बताने के लिए मैं जिंदा हूं। इससे पूर्व भी राष्ट्रपति के लिए नामांकन किया किंतु फार्म रिजेक्ट हो गया। पीएम के खिलाफ भी चुनाव लड़ा। सिर्फ यह जताने के लिए कि मैं जिंदा हूं।


दरसअल संतोष मूरत का कहना है की आंच फिल्म की शूटिंग के लिए नाना पाटेकर वर्ष 1988 में गांव में आए थे। इस दौरान उन्होंने हमें अपने साथ मुंबई चलने का ऑफर दिया। वर्ष 2000 में मुंबई चला गया। फिर क्या, वही मेरा माता, वही मेरा पिता बन गए। मुंबई में एक लड़की से प्यार हुआ। दलित जाति की थीं। हालांकि अब साथ नहीं हैं। शादी कर घर बसा चुकी हैं। अब प्रकरण का पटाक्षेप हो चुका है। किंतु वर्ष 2003 में जब गांव आया तो एक बड़ा हादसा हुआ। लगभग 12.5 एकड़ जमीन, बाग बगिचा आदि पट्टीदारों ने दस्तावेजों में मुझे मृतक दिखाकर पूरी संपत्ति अपने नाम करा ली। दस्तावेज में जिंदा होने के लिए तब से संघर्ष कर रहा हूं।लेकिन अब तक इन्साफ नहीं मिल पाया |