अमेरिका के वैज्ञानिक प्रोफेसर बॉरुईबा का कोरोना पर नया खुलासा |

कोरोना वायरस के आगमन के साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग(social distancing) का एक महत्वपूर्ण कंसेप्ट हम सभी की संज्ञान में आया जिसमें सभी को डॉक्टरों,वैज्ञानिकों द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने  के निर्देश दिए जा रहे हैं।सोशल डिस्टेंसिंग(social distancing) के तहत एक दूसरे से 1 मीटर की दूरी बनाए रखने की जरूरत है।

कोरोना वायरस के आगमन के साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग(social distancing) का एक महत्वपूर्ण कंसेप्ट हम सभी की संज्ञान में आया जिसमें सभी को डॉक्टरों,वैज्ञानिकों द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने  के निर्देश दिए जा रहे हैं।सोशल डिस्टेंसिंग(social distancing) के तहत एक दूसरे से 1 मीटर की दूरी बनाए रखने की जरूरत है। इसी क्रम में बाजारों में 1 मीटर की दूरी पर निशान बनाकर लोगों को जरूरी सामग्री मुहैया कराई जा रही है यहाँ तक की दवाईयों की दुकान पर भी मेडिकल शॉप और ग्राहकों के बीच रस्सी के माध्यम से दूरी बनाई जा रही है।

लेकिन इस बीच हाल ही में अमेरिका के  एम.आई.टी के वैज्ञानिक व एसोसिएट प्रोफेसर लीडिया बॉरुईबा(assistant professor Lydia Bourouiba of MIT) ने ड्रॉपलेट्स पर किये अपने शोध अध्ययन में सोशल डिस्टेंसिंग(social distancing for coronavirus) के कुछ नई कड़ियों का खुलासा किया है। न्यूयॉर्क पोस्ट में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस के इस संक्रमण की कड़ी को तोड़ने के लिए अब सोशल डिस्टेंसिंग के दायरे बढ़ाने होंगे।जी हां कोरोना से बचाव के लिए 1 या 2 मीटर नहीं बल्कि लोगों के बीच लगभग 8 मीटर यानी 27 फीट तक की दूरी होनी चाहिए।अपने शोध में उन्होंने पाया कि ड्रॉपलेट्स यानी संक्रमित व्यक्ति की छींक या खांसी के कण 23 से 27 फीट की दूरी तय कर सकते हैं। साथ ही यह हवा में लंबे समय तक जीवित भी रह सकते है।ऐसे में 1 मीटर या 3 मीटर की दूरी बनाना बेअसर साबित होगा।उन्होंने बताया कि कोरोना से बचाव के लिए 27 फीट की दूरी बनाने के पीछे कारण यह है कि संक्रमित व्यक्ति के ड्रॉपलेट्स में मौजूद वायरस 27 फीट तक की दूरी तय कर सकता है। तो अगर संक्रमित व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से 26 फीट की दूरी पर है तो संभवत अगले व्यक्ति के संक्रमित होने के 99% chances हो जाते हैं। इसलिए ऐसे खतरनाक स्थिति में सोशल डिस्टेंसिंग के तहत लोगों को एक-दो नहीं बल्कि 8 मीटर(27 फिट) की दूरी बना कर चलने की जरूरत है।

इस पर प्रोफेसर बॉरुईबा ने सोशल डिस्टेंसिंग(Lydia Bourouiba on social distancing) के पुराने आधार को बेअसर बताते हुए कहा कि  ड्रॉपलेट्स जमीनी सतहों को भी दूषित कर सकती हैं। इसकी छोटी सी बूंद भी लंबे समय तक हवा में मौजूद रहती है और चेतावनी दी कि अगर सोशल डिस्टेंसिंग के तरीकों में बदलाव नहीं हुआ तो यह संक्रमण रूकने वाला नहीं है। साथ ही उन्होंने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के गाइडलाइंस(guideline of WHO - World Health Organization) में तत्काल परिवर्तन करने की भी बात कही।