जीरो डॉलर के नीचे कच्चे तेल का भाव, भारत में घटेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम ?

कोरोना वायरस कोरोना प्रकोप के कारण दुनिया भर के कई देशों में कामकाज ठप है| ऐसे में क्रूड आयल की डिमांड कम होने के कारण की ओवर सप्लाई हो रही है| जिसकी वजह से सोमवार को कच्चे तेल का भाव -37.63 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क गया| कोरोना संक्रमण के कारण कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है। दुनिया भर के कई शहर, फैक्ट्रियां, ट्रांस्पोर्टेशन और

जीरो डॉलर के नीचे कच्चे तेल का भाव, भारत में घटेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम ?

 

सभी तरह के उद्द्योग पूरी तरह बंद है| रविवार शाम कच्चे तेल की कीमत 21 सालों के न्यूनतम स्तर पर गिरकर 15 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ थी तो सोमवार को यह -37.63 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क गया|  इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब कच्चे तेल का भाव नेगेटिव में चला गया| अमेरिकी वायदा बाजार में कच्चे तेल का भाव सोमवार को जीरो डॉलर प्रति बैरल से नीचे चल गया |

कच्चे तेल में ऐतिहासिक गिरावट के बावजूद भी  भारत में पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतें प्रभावित नहीं होंगी| क्योंकि भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, तेल खपत का 85 फीसदी हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है|  ऐसे में जब भी क्रूड सस्ता होता है तो भारत को फायदा होता है|  तेल जब सस्ता होता है तो आयात में कमी नहीं पड़ती बल्कि भारत का बैलेंस ऑफ ट्रेड भी कम होता है|

भारत में तेल की कीमतें दो मुख्य चीजों पर निर्भर करती हैं| एक अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत और दूसरा सरकार द्वारा लगाया गया टैक्स| भारत में हम जिस रेट पर तेल खरीदते हैं, उसमें करीब 50 फीसदी से ज्यादा टैक्स होता है|  इसमें करीब 35 फीसदी एक्साइज ड्यूटी और 15 फीसदी राज्यों का वैट या सेल्स टैक्स होता है|  इसके अलावा कस्टम ड्यूटी और  डीलर कमीशन, तेल के बेस प्राइस में कच्चे तेल की कीमत, उसे शोधित करने वाली रिफाइनरीज का खर्च भी जुड़ता है| इसलिए, क्रूड की कीमतें सीधे खुदरा कीमतों को प्रभावित नहीं करती हैं| क्रूड ऑयल के रेट पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता,  लेकिन सरकार आयल पे लगने वाले टैक्स को अपने स्तर से घटा-बढ़ा सकती है|  यानी जरूरत पड़ने पर सरकार टैक्स कम कर बढ़े दाम से कुछ हद तक जनता को फायदा पहुंचा सकती है|  पहले देश में तेल कंपनियां खुद दाम नहीं तय करती थीं, इसका फैसला सरकार के स्तर से होता था| मगर जून 2017 से सरकार ने पेट्रोल के दाम को लेकर अपना नियंत्रण हटा लिया है, जिसके बाद  अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिदिन के उतार-चढ़ाव के हिसाब से कीमतें तय होती  हैं |

क्या होगा गिरती कीमतों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर?
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक होने के नाते और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने पर क्रूड-इंटेंसिव इकोनॉमी हासिल करता है|  यह ऑयल इम्पोर्ट बिल को कम करने में मदद करता है और ट्रेड बैलेंस को बेहतर बनाने में मदद करता है|  यह रुपये की वैल्यू को सपोर्ट करने में मदद करता है और इससे महंगाई भी कंट्रोल होती है| कोरोना वायरस संकट के कारण कच्चे तेल की मांग में आई भारी कमी  और तेल स्टोरेज के लिए पैदा हुई समस्याओं के कारण तेल की कीमतों में यह गिरावट दर्ज की गई है। कच्चे तेल का ग्लोबल स्टोरज इस समय अपनी सीमा तक भर गया  हैं|  इसी समय, रूस और सऊदी अरब ने अतिरिक्त आपूर्ति के साथ दुनिया में कच्चे तेल की बाढ़ ला दी हैं| इस दोहरी मार से तेल की कीमतें गिरकर जीरो के नीचे चली गईं हैं |

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सबसे ज्यादा फायदा एयरलाइंस,ऑयल मार्केटिंग कंपनियों  और पेंट कंपनियों को होगा| लेकिन ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए यह उतना आसान नहीं है क्योंकि वे पहले से ही महंगा तेल खरीद चुकी  हैं और वे अभी मांग में गिरावट से भी आहत हैं| इसलिए ओएनजीसी और ओआईएल जैसी तेल उत्पादन कंपनियों को कम तेल की कम कीमतों से नुकसान झेलना  होगा|