विवाद के बीच ससुराल पहुँची गौरा,भक्तों ने जमकर उड़ाया गुलाल |

तमाम आशंकाओं और विवाद को दर किनार करतें हुए आखिरकार काशी के आराधय बाबा विश्वनाथ ने भक्तों के साथ जमकर होली खेली ये अलग बात है कि पिछले 365 सालों से भगवान की पालकी मंदिर से 300 कदम दूर से निकलकर गर्भ गृह पहुँचता था लेकिन अबकी ये दुरी एक किलोमीटर की रही। महंथ परिवार के दोनों भाइयों ने अपनी अपनी यात्रा निकालने की घोषणा की थी

तमाम आशंकाओं और विवाद को दर किनार करतें हुए आखिरकार काशी के आराधय बाबा विश्वनाथ ने भक्तों के साथ जमकर होली खेली ये अलग बात है कि पिछले 365 सालों से भगवान की पालकी मंदिर से 300 कदम दूर से निकलकर गर्भ गृह पहुँचता था लेकिन अबकी ये दुरी एक किलोमीटर की रही। महंथ परिवार के दोनों भाइयों ने अपनी अपनी यात्रा निकालने की घोषणा की थी जिससे तनाव की स्थिति कायम थी लेकिन प्रशासन ने छोटे भाई को घर में नजरबन्द कर कार्यक्रम को सम्प्पन कराया । परम्परागत ढंग से बड़े भाई ने  टेढ़ी नीम स्थित गेस्ट हाउस से यात्रा को निकाल पर परम्परागत तरिके से आगे बढ़ाया। इस दौरान डमरू की डम डम से पूरा क्षेत्र गूंजता रहा तो दूसरी तरफ भक्तो ने भी भगवान् शंकर और माता गौरा संग जमकर होली खेली। 


बता दे की बाबा विश्वनाथ के दरबार में रंगभरी एकादशी की परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। शोभायात्रा की ज्ञात तिथि 1842 मानी जाती है। हालांकि इसका इतिहास और भी पुराना माना जाता है। पहले काठ के पालकी पर शिव परिवार की शोभायात्रा निकलती थी, लेकिन 1890 में स्वर्गीय पं.रामदत्त त्रिपाठी के समय पहली बार रजत सिंहासन पर भगवान शंकर, माता पार्वती व गणोश की चल रजत प्रतिमाओं को सुशोभित किया गया था, जो कि अब तक बरकरार है और आगे भी रहेगा। चल रजत प्रतिमाएं अनादि काल की हैं। पहली बार स्व. पं. विशेश्वर दयाल त्रिपाठी के सान्निध्य में शोभायात्रा निकाली गयी थी।