सरकार के कई वादे पर मजदुर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर

कोरोना वायरस की वजह से हुवे देश में लाकडाउन ने सबसे ज्यादा बुरा असर डाला है मजदूरों पर, आज जिस तरह से ये मजदुर इस चिलचिलाते धुप में सड़को पर पैदल चलने को मजबूर है इससे आप ये अंदाजा जरूर लगा सकते है की सरकार इनके लिए कितना कर रही है |

 

आज जब भी आप T.V खोल कर बैठते हो आप हर रोज 2 तरह की खबरे सुनते हो पहला ये की सरकार मजदूरों के लिए क्या क्या इंतजाम कर रही है दूसरी ये की सड़को पर पैदल चलते हुवे कितने मजदुर अपनी जान गवा रहे हैं | अब यहाँ ये सवाल आ खड़ा हुवा है की यदि सरकार ने इन मजदूरों के लिए तमाम इंतजाम किये है तो आख़िर ये मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को क्यों मजबूर हुए? जिन राज्यों में ये मजदूरी करने गये थे वहां ऐसी क्या परिस्थियां बनी जिससे ये मजदूर एक हजार किलोमीटर से ज्यादा दूरी को पैदल नापने के लिए मजबूर हुए। केंद्र और राज्य सरकारों की तमाम घोषणाओं और आश्वासन के बाद भी ये मजदूर अपने आपको उन महानगरों में महफूज नहीं महसूस कर पा रहे हैं, जहां पर इन्होंने दशकों गुजारा किया था और अपने सपने बनाये थे ।

आज ऐसा ही कुछ नजारा यूपी के चंदौली में देखने को मिला है जहां एनएच 2 पर काफी मजदुर पैदल चलते हुवे दिखाई पड़े ।दरअसल यह एनएच 2 यूपी को बिहार झारखंड व पश्चिम बंगाल से जोड़ता है| दिल्ली मुंबई चेन्नई जैसे बड़े महानगरों से लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के बदहाली का नजारा आप यहां खुलेआम सकते है | यह वही श्रमिक है जो अपने गांव शहर को छोड़कर महानगरों में नौकरी की तलाश में निकले थे और पेट पालने के लिए कहीं ना कहीं नौकरी कर रहे थे।लेकिन आज लॉक डाउन के चलते आलम यह है कि यह मजदूर बिल्कुल बेबस और मजबूर है।जो अपनी नौकरी तो गवा चुके लेकिन अपने घर पहुंचने के लिए आज पैदल चलने के लिए मजबूर हैं।सरकार प्रवासी मजदूरों के लिए बसों और ट्रेनों को चलाने का लाख दावा कर रही हो लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है।नेशनल हाईवे पर महिलाएं बुजुर्ग बच्चे भूख प्यास से बेहाल पैदल जाते हुए दिख रहे हैं | आज ये नजारा हमें ये सोचने पर मजबूर कर दी है की क्या सरकार जो वाडे कर रही है वो जमीनी हकीकत होगी |