देविका रानी, भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री |

देविका रानी को भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री कहा जाता है|  देविका रानी चौधरी का जन्म वाल्टेयर (विशाखापत्तनम) में हुआ था। वे विख्यात कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर के वंश से सम्बंधित थीं, श्री टैगोर उनके चचेरे परदादा थे। उनके पिता कर्नल एमएन चौधरी समृद्ध बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे|  जो बाद में  मद्रास (अब चेन्नई) के पहले 'सर्जन जनरल' बने थे।

देविका रानी को भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री कहा जाता है|  देविका रानी चौधरी का जन्म वाल्टेयर (विशाखापत्तनम) में हुआ था। वे विख्यात कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर के वंश से सम्बंधित थीं, श्री टैगोर उनके चचेरे परदादा थे। उनके पिता कर्नल एमएन चौधरी समृद्ध बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे|  जो बाद में  मद्रास (अब चेन्नई) के पहले 'सर्जन जनरल' बने थे। देविका की माता का नाम श्रीमती लीला चौधरी था।
जिस जमाने में भारत की महिलायें घर की चारदीवारी के भीतर भी घूंघट में मुँह छुपाये रहती थीं, जिस दौर में महिलाओं को घर से निकलने नहीं दिया जाता था, देविका फिल्म नायिका बनकर समाज के लिए नायक बन गईं. उन्हें उनके अद्वितीय सुंदरता के लिये भी याद किया जाता रहेगा।
1920  के दशक में  की शुरुआत जब देविका रानी 9 साल की थीं, तब  पढ़ाई-लिखाई के लिए उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया|  पढ़ाई पूरी करने के बाद देविका भारत इस निश्चय के साथ लौटीं कि वो अपना करियर फिल्मों में बनाएंगी. लेकिन परिवार की ओर से इसकी इजाजत नहीं मिली.
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इंग्लैंड में कुछ साल रहकर देविका रानी ने रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट में अभिनय की पढ़ाई की, इसके बाद उन्होंने Architecture में डिप्लोमा भी किया | इसी  दौरान देविका रानी की मुलाकात फिल्म निर्माता बुस्र बुल्फ से हुई|, बुस्र देविका की Architecture के हुनर को देखकर काफी प्रभावित हुए और उन्होंने देविका को बतौर डिजाइनर अपॉइंट  कर लिया|
इसी बीच उनकी मुलाकात प्रसिद्ध निर्माता हिमांशु राय से हुई, हिमांशु देविका की खूबसूरती पर मुग्ध हो गए और साल 1933 में अपनी फिल्म 'कर्म' में काम देने की पेशकश की, जिसे देविका ने भी झट से हामी भर दी, इस फिल्म में देविका के हीरो हिमांशु राय ही बने|  यह किसी भारतीय के हाथों बनी पहली अंग्रेजी बोलने वाली फिल्म थी| इसमें पहली बार चार मिनट का किसिंग सीन दिखाया गया था , जिसके बाद देविका की काफी आलोचना हुई और फिल्म को बैन  कर दिया गया | इसके बाद हिमांशु ने सन् 1929 देविका से शादी कर ली और मुंबई आ गए| उनकी दिग्गज फिल्मों में 1936 में आई अछूत कन्या, 1937 में आई जीवन प्रभात और 1939 में आई दुर्गा शामिल है|  देविका ने पति के साथ मिलकर बॉम्बे टॉकीज नाम का स्टूडियो बनाया, जिसके बैनर तले कई सुपर हिट फिल्में आईं. अशोक कुमार, दिलीप कुमार, मधुबाला और राज कपूर जैसे सितारों का करियर उनके हाथों परवान चढ़ा|  दिलीप कुमार को फिल्म इंडस्ट्री में लाने का श्रेय देविका को ही दिया जाता है|
सन् 1940 में पति की मौत और बॉम्बे टॉकीज को छोड़ने बाद देविका रानी लगभग टूट सी गई थीं|  अपने स्टुडिओ बांबे टाकीज़ के बचने और संचालन के लिये  उन्होंने  जी जान लड़ा दिया लेकिन 1943 में सशधर और अशोक कुमार तथा अन्य विश्वसनीय लोगों के स्टुडिओ से नाता तोड़ लेने की वजह से वे असहाय हो गईं। उन लोगों ने बांबे टाकीज़ से नाता तोड़ के एक नया स्टुडिओ फिल्मिस्तान बना लिया। इसके बाद  देविका रानी को फिल्मों से अपना नाता तोड़ना पड़ा| इसी बीच  देविका की मुलुकात  रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रॉरिक से हुई, जिसके बाद दोनों ने  शादी कर ली और बंगलौर में जाकर बस गईं। इस तरह देविका ने  फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया.

फिल्म इंडस्ट्री में योगदान देने के लिए भारत सरकार ने साल 1969 में जब दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की शुरुआत की तो इसकी सर्वप्रथम विजेता देविका रानी बनीं|  देविका फिल्म इंडस्ट्री की प्रथम महिला बनीं, जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया| देविका रानी का अंतिम संस्कार सम्पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया गया था।