आदर्श शिक्षक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिन्हे मिला भारत का पहला

आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है. आज डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पुण्यतिथि है साल 1975 में आज ही के दिन उनका निधन हुआ था.वे दर्शनशास्त्र का बहुत ज्ञान रखते थे, उन्होंने ही भारतीय दर्शनशास्त्र में पश्चिमी सोच की शुरुवात की थी. राधाकृष्णन प्रसिद्ध शिक्षक भी थे,डॉ. राधाकृष्णन मानते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा, तब तक शिक्षा को मिशन का सही रूप नहीं मिल पाएगा.यही वजह है, उनकी याद में हर वर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है|

आदर्श शिक्षक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिन्हे मिला भारत का पहला

बीसवीं सदी के विद्वानों में उनका नाम सबसे ऊपर  है. वे हमेशा से पश्चिमी सभ्यता से अलग, हिंदुत्व को देश में फैलाना चाहते थे. राधाकृष्णन जी ने हिंदू धर्म को भारत और पश्चिम दोनों में फ़ैलाने का प्रयास किया, उनका मानना था कि शिक्षकों का दिमाग देश में सबसे अच्छा होना चाहिए , क्यूंकि देश को बनाने में उन्हीं का सबसे बड़ा योगदान होता है.उन्हें 1931 में ब्रिटिश सरकार द्वारा "सर" की उपाधि प्रदान की गयी थी, हालांकि स्वतंत्रता मिलने के बाद उन्होंने कभी अपने नाम के साथ इस उपाधि को नहीं जोड़ा।

डॉ राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु के छोटे से गांव तिरुमनी में ब्राह्मण परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम सर्वपल्ली विरास्वामी था, वे विद्वान ब्राम्हण थे|  अपनी शुरुआती शिक्षा लूनर्थ मिशनरी स्कूल, तिरुपति और वेल्लूर से ली थी. इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई की.राधाकृष्णन ने 16 साल की उम्र में अपनी दूर की चचेरी बहन सिवाकमु से शादी कर ली. जिनसे उन्हें 5 बेटी व 1 बेटा हुआ. इनके बेटे का नाम सर्वपल्ली गोपाल है, जो भारत के महान इतिहासकार थे| 1909 में राधाकृष्णन जी को मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र का अध्यापक बना दिया गया| बता दें कि उन्होंने दर्शन शास्त्र से एम.ए. किया और 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में सहायक अध्यापक के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई.1918 मैसूर यूनिवर्सिटी के द्वारा उन्हें दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में चुना गया|  इसके बाद वे इंग्लैंड के oxford university में भारतीय दर्शन शास्त्र के शिक्षक बन गए. उन्होंने 40 वर्षो तक शिक्षक के रूप में काम किया.1939 से वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बतौर कुलपति रहे । शिक्षा के प्रति उनका समर्पण का भाव ऐसा था कि बतौर कुलपति वेतन लेने से भी परहेज रखा। एक दौर ऐसा भी था जब उनके कार्यकाल के दौरान सन् 1942 में अंग्रेजों ने भारत छोड़ो आंदोलन में बीएचयू के छात्रों की हिस्सेदारी की मंशा जान कर विश्वविद्यालय बंद कराने का काफी प्रयास किया। ऐसे में डा. राधाकृष्णन ने प्रयास कर बीएचयू को बचाने की पूरी कोशिश की और ब्रिटिश सरकार की मंशा को सफल नहीं होने दिया। उनका मानना था कि यह राष्ट्रीय संस्था है, लिहाजा यहां नि:स्वार्थ सेवा ही सच्ची राष्ट्र सेवा है। स्वतंत्रता के बाद भी डॉ. राधाकृष्णन ने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वो यूनेस्को की कार्यसमि‍ति के अध्यक्ष भी बनाए गए। यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंग है। सन् 1949 से सन् 1952 तक डॉ. राधाकृष्णन रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत पद पर काम किया ।
 कह सकते है भारत रूस की मित्रता बढ़ाने में उनका भारी योगदान रहा था।

साल 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाए गए। महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक सर्वपल्ली राधाकृष्णन को सन् 1954 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया। वह भारत रत्न पाने वाले पहले व्यक्ति थे। 13 मई, 1962 को डॉ. राधाकृष्णन भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने। उन्हें 1931 में ब्रिटिश सरकार द्वारा "सर" की उपाधि प्रदान की गयी थी |

डॉ. राधाकृष्णन को 27 बार नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था। जिसमें वह 16 बार लिटरेचर और 11 बार नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट हुए थे। 17 अप्रैल 1975 को एक लम्बी बीमारी के बाद डॉ राधाकृष्णन का निधन हो गया. राधाकृष्णन को मरणोपरांत 1975 में अमेंरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है. इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे. भले ही भारत ने इन महान व्यक्तित्व को खो दिया हो लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में और एक आदर्श शिक्षक के रूप में डॉ राधाकृष्णन को हमेंशा याद किया जाएगा.एक आदर्श शिक्षक और दार्शनिक के रूप में वह आज भी सभी के लिए प्रेरणादायक हैं |