महिला दिवस पर आधारित - आखिर कौन थी आनंदीबाई और कैसे बीता उनका जीवन?

आनंदीबाई ने कोलकाता (कलकत्ता) से पानी के जहाज से न्यूयॉर्क  गयी, न्यूयॉर्क में थिओडिसिया कार्पेन्टर ने उन्हें जून 1883 में  आनंदीबाई को पेंसिल्वेनिया की वूमन मेडिकल कॉलेज में अपने चिकित्सा कार्यक्रम में भर्ती होने के लिए नामंकन किया, जो कि दुनिया में दूसरा Women's medical program था।

महिला दिवस पर आधारित - आखिर कौन थी आनंदीबाई और कैसे बीता उनका जीवन?

आनंदीबाई जोशी,
एक भारतीय महिला मेडिकल स्कूल के लिए इतनी दूर क्यों जाएगी?

"क्योंकि यह उसके देश की सेवा करने का सबसे अच्छा तरीका है।"

यह 1883 में आनंदीबाई जोशी द्वारा दिए गए जवाब का कुछ सार था

आनंदीबाई जोशी  का जन्म 31 मार्च 1865-26 फ़रवरी 1887 महाराष्ट्र के पुणे शहर में हुआ |  वे  पहली भारतीय महिला थीं, जिन्‍होंने डॉक्‍टरी की डिग्री ली थी। जिस दौर में महिलाओं की शिक्षा भी दूभर थी, ऐसे में विदेश जाकर डॉक्‍टरी की डिग्री हासिल करना अपने-आप में एक मिसाल है।  नौ साल की अल्‍पायु में  उनका विवाह उनसे करीब 20 साल बड़े गोपालराव से हुआ  और 1 4 साल की उम्र में वे माँ बनीं | लेकिन  उनकी  इकलौती संतान की मृत्‍यु 10 दिनों में ही गई, जिससे  आनंदी को बहुत बड़ा आघात लगा। अपने बच्चे को खो देने के बाद उन्‍होंने यह प्रण किया कि वह एक दिन डॉक्‍टर बनेंगी और ऐसी असमय मौत को रोकने का प्रयास करेंगी। उनके पति गोपालराव ने भी उनको भरपूर सहयोग दिया और उनकी हौसला अफजाई की।

आनंदीबाई जोशी का व्‍यक्तित्‍व महिलाओं के लिए प्रेरणास्‍त्रोत है। वे सन  1880 में अपने अपने को साकार करने के लिए अमेरिका चली गयी, उनके अमेरिका जाने की कहानी भी संघर्षो से भरी थी|  उनके पति गोपालराव ने उनका साथ दिया और आनंदीबाई को डॉक्‍टरी का अध्ययन करने के लिए 1880 में उन्होंने एक प्रसिद्ध अमेरिकी मिशनरी रॉयल वाइल्डर को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने संयुक्त राज्य में औषधि अध्ययन में आनंदीबाई की रूचि के बारे में बताया और खुद के लिए अमेरिका में एक नौकरी के बारे में पूछताछ किया। वाइल्डर ने उनके इस आग्रह को अख़बार में प्रकाशित किया।इसी दौरान  थॉडिसीया कार्पेन्टर, जो  न्यू जर्सी की निवासी थीं, अपने दांत के इलाज ट्रीटमेंट के लिए इंतजार करते वक्त यह पढ़ा। औषधि अध्ययन करने के लिए आनंदीबाई की इच्छा और पति गोपालराव के समर्थन से प्रभावित होकर उन्होंने अमेरिका में आनंदीबाई के लिए आवास की पेशकश की।जब जोशी युगल कलकत्ता में थे, आनंदीबाई का स्वास्थ्य कमजोर हो रहा था। वह कमजोरी, निरंतर सिरदर्द, कभी-कभी बुखार और कभी-कभी सांस की वजह से पीड़ित थीं। थॉडिसीया ने बिना जाने अमेरिका से उसकी दवाएं भेजीं। 1883 में गोपालराव को सेरामपुर में स्थानांतरित कर दिया गया था, और उन्होंने कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद मेडिकल अध्ययन के लिए आनंदीबाई को अमेरिका भेजने का फैसला किया और गोपालराव ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अन्य महिलाओं के लिए उदाहरण बनने के लिए कहा। थॉर्बोर्न नामक एक चिकित्सक जोड़े ने आनंदीबाई को पेंसिल्वेनिया के महिला चिकित्सा महाविद्यालय में आवेदन का सुझाव दिया। जब आनदीबाई ने विदेश  में उच्च शिक्षा हासिल करने का  निर्णय किया , तब समाज में उनकी  काफी आलोचना हुई ,कि एक शादीशुदा हिंदू स्‍त्री विदेश (पेनिसिल्‍वेनिया) जाकर डॉक्‍टरी की पढ़ाई करे। उन्हें बहुत बुरा भला कहा और पुरुषवादी समाज में उनको दबाने की भी खूब कोशिशें की गयी, लेकिन आनंदीबाई एक दृढ़निश्‍चयी महिला थीं और उन्‍होंने आलोचनाओं की तनिक भी परवाह नहीं की। और आलोचनाओं को गलत अबित करने के लिए आनंदीबाई ने सेरमपुर कॉलेज (पश्चिम बंगाल) हॉल में समुदाय को संबोधित किया, जिसमें अमेरिका जाने और मेडिकल डिग्री प्राप्त करने के फैसले को समझाया। उन्होंने भारत में महिला डॉक्टरों की जरूरत पर बल दिया और भारत में महिलाओं के लिए एक मेडिकल कॉलेज खोलने के अपने लक्ष्य के बारे में बात की  उनके भाषण ने प्रचार प्राप्त किया, और पूरे भारत में वित्तीय योगदान शुरू हो गए। यही वजह है कि उन्‍हें पहली भारतीय महिला डॉक्‍टर होने का गौरव प्राप्‍त हुआ।

अमेरिकी जीवन
आनंदीबाई ने कोलकाता (कलकत्ता) से पानी के जहाज से न्यूयॉर्क  गयी, न्यूयॉर्क में थिओडिसिया कार्पेन्टर ने उन्हें जून 1883 में  आनंदीबाई को पेंसिल्वेनिया की वूमन मेडिकल कॉलेज में अपने चिकित्सा कार्यक्रम में भर्ती होने के लिए नामंकन किया, जो कि दुनिया में दूसरा Women's medical program था। राहेल बोडले जो उस वक़्त  मेडिकल कालेज के डीन थे उन्हीने आनंदीबाई का अपने कालेज में दाखिला कर लिया ।

आनंदिबाई ने 19 वर्ष की उम्र में अपना चिकित्सा प्रशिक्षण शुरू किया। अमेरिका में ठंडे मौसम और अलग खानपान के कारण उनका स्वास्थ्य खराब हो गया था। उन्हें तपेदिक यानि Tuberculosis हो गया था फिर भी उन्होंने 11 मार्च 1885 को एमडी से ग्रेजुएशन किया। उनकी थीसिस का विषय था "आर्यन हिंदुओं के बीच प्रसूति"। आनंदिबाई  ग्रेजुएशनकी पढ़ाई पर रानी विक्टोरिया ने उन्हें एक बधाई संदेश भी भेजा था।

भारत वापसी
1886 के अंत में,डिग्री पूरी करने के बाद आनंदीबाई भारत वापस लौटीं आई |  भारत में उनका भव्य स्वागत हुआ, कोल्हापुर की रियासत ने उन्हें स्थानीय अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल की महिला वार्ड के चिकित्सक प्रभारी के रूप में नियुक्त किया। लेकिन भारत वापसी  के बाद आनंदीबाई का स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ने लगा और अगले ही वर्ष, 26 फरवरी 1887 को आनंदीबाई की 22 साल की उम्र में तपेदिक से मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु पर पूरे भारत में शोक व्यक्त किया गया।आनंदीबाई  की  राख को थियोडिसिया कारपेंटर के पास भेजा गया, जिसने उन्हें न्यूयॉर्क के पुफेकीसी ग्रामीण कब्रिस्तान में अपने परिवार के साथ  रखा था । कब्रिस्तान की शिलालेख पर लिखा गया है कि "आनंदी जोशी एक हिंदू ब्राह्मण लड़की थी, जो विदेश में शिक्षा प्राप्त करने और मेडिकल डिग्री प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला थी।" और बाईस वर्ष की अल्‍पायु में ही उनकी मृत्‍यु हो गई। यह सच है कि आनंदीबाई ने जिस उद्देश्‍य से डॉक्‍टरी की डिग्री ली थी, उसमें वे पूरी तरह सफल नहीं हो पाईंं, परन्तु उन का व्‍यक्तित्‍व महिलाओं के लिए प्रेरणास्‍त्रोत है। उन्‍होंने समाज में वह स्थान प्राप्त किया, जो आज भी एक मिसाल है|

विरासत
1888 में, अमेरिकी नारीवादी लेखक कैरोलिन वेल्स हीली डैल ने आनंदीबाई की जीवनी लिखी थी।