7 साल, 3 माह और 4 दिन बाद आखिर निर्भया को मिल गया इंसाफ

7 साल, 3 माह और 4 दिन बाद आखिरकार निर्भया को इंसाफ मिल गया। आज के बाद ये मामला भविष्‍य में लोगो को याद रहेगा | 16 दिसंबर 2012 की रात को निर्भया को क्या पता था की वो रात उसके लिए कितनी भयानक और दर्दनाक होगी उस रात जब वो अपने दोस्त के साथ घर वापस लौट रही थी तब निर्भया के दोस्‍त ने ऑटो से ही सीधा घर जाने का मन बनाया था लेकिन ऑटो वाला आगे जाने को तैयार नहीं हुआ।

7 साल, 3 माह और 4 दिन बाद आखिरकार मिल गया निर्भया को इंसाफ

7 साल, 3 माह और 4 दिन बाद आखिरकार निर्भया को इंसाफ मिल गया। आज के बाद ये मामला भविष्‍य में लोगो को याद रहेगा | 16 दिसंबर 2012 की रात को निर्भया को क्या पता था की वो रात उसके लिए कितनी भयानक और दर्दनाक होगी उस रात जब वो अपने दोस्त के साथ घर वापस लौट रही थी तब निर्भया के दोस्‍त ने ऑटो से ही सीधा घर जाने का मन बनाया था लेकिन ऑटो वाला आगे जाने को तैयार नहीं हुआ। और दोनों को ऑटो से मुनिरका उतरना पड़ा । उस वक्‍त एक सफेद रंग की बस वहां पर पहले से खड़ी थी। इसमें से एक लड़का निर्भया को दीदी कहकर पूछा कहा जाना है दीदी। उस लड़के ने दोनों से पालम गांव जाने की बात कही इसके बाद दोनों बस में बैठ गए।बस में लड़के को मिलाकर छह लोग मौजूद थे। । निर्भया के दोस्‍त ने एक निजी चैनल को बताया था कि बस चलने के बाद उन्‍हें ऐसा लगा कुछ ठीक नहीं है। किराया लेने के कुछ समय बाद उस लड़के ने बस के गेट को बंद कर दिए। पीछे बैठे तीन लोग आगे आ गए और निर्भया के दोस्‍त से पहले बदतमीज की और फिर कहासुनी होने पर उन्‍होंने इनसे मारपीट शुरू कर दी। इन लोगों ने उनसे उनका फोन छीन लिया। जब निर्भया अपने दोस्‍तको बचने के लिए आगे आई तो इन सभी लोगों ने उसके साथ न सिर्फ मारपीट की बल्कि उसके साथ दुष्‍कर्म किया था। इस दौरान निर्भया के दोस्‍त ने जब उसको बचाने की कोशिश की तो उसको इन्‍होंने लोहे की रॉड मारकर घायल कर दिया था, जिसके बाद वो बेहोश हो गए। इसके बाद जो दर्दनाक सिलसिला निर्भया के साथ शुरू हुआ उसको शब्‍दों में बया कर पाना काफी मुश्किल है। इन दरिंदों ने अपनी हवस को मिटाने के साथ ही निर्भया के शरीर में लोहे ही रॉड घुसा दी थीऔर उसके शरीर को नौंच डाला था। इसके बाद दोनों को सड़क पर फेंक कर इन्‍होंने इन पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश भी की लेकिन ये बच गए।जिस जगह पर दोनों को फेंका गया था वह दक्षिण दिल्ली के महिपालपुर के नजदीक वसंत विहार इलाका था। वहां से लगातार गाड़ियां और ऑटो गुजर रहे थे लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की । निर्भया के दोस्‍त ने इनसे मदद की अपील भी की लेकिन वहां कोई नहीं रुका। आखिर में एक बाइक वाला उन्‍हें देखकर रुका और उसने पहले एक फोन किया और फिर एक गाड़ी और एक पीसीआर वैन वहां पर आई। वहां से उन्‍हें अस्‍पताल ले जाया गया। अगली सुबह ये खबर पूरी दिल्‍ली के साथ पूरे देश में फैल चुकी थी। हर कोई निर्भया की जिंदगी और उसको इंसाफ की मांग कर रहा था। एक तरफ लोग जहां सड़कों पर उतर गए थे वहीं निर्भया अस्‍पताल में अपनी जिंदगी की जंग लड़ रही थी। दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी निर्भया देखने अस्‍पताल गई थीं। उन्‍होंने बाद में एक चैनल से कहा था कि निर्भया की हालत देखने के बाद उनके रौंगटे खड़े हो गए थे। उनमें इतनी हिम्मत नहीं कि वो पीड़ित लड़की को दोबार देख सकें।इसके बाद सोनिया गांधी भी सफदरजंग अस्पताल जाकर पीड़ित लड़की का हालचाल जाना था। हालात खराब होते देख तत्‍कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने निर्भया को इलाज के लिए सिंगापुर के माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराने का फैसला लिया। लेकिन सिंगापुर के रास्‍ते में निर्भया को जबरदस्‍त दिल का दौरा पड़ा था लेकिन किसी तरह से वो अस्‍पताल पहुंच गई थी। वहां पर डॉक्‍टरों ने उसको बचाने की लाख कोशिश की लेकिन बचा नहीं सके और 29 दिसंबर को निर्भया ने रात के करीब सवा दो बजे वहां दम तोड़ दिया था। इस पूरे मामले में दिल्‍ली पुलिस की महिला अधिकारी ने तुरंत कार्यवाही करते हुए छह में से चार आरोपियों राम सिंह, मुकेश, विनय शर्मा और पवन गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया । 21 दिसंबर 2012 को पुलिस ने पांचवें आरोपी जो नबालिग था उसे दिल्ली से और छठे आरोपी अक्षय ठाकुर को बिहार से गिरफ्तार किया था। साकेत की फास्‍ट ट्रेक कोर्ट में यह मामला सुना गया।इस मामले में पुलिस ने 80 लोगों को गवाह बनाया। इसी बीच 11 मार्च, 2013 को आरोपी बस चालक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली। जब अदालत ने चारो वयस्क दोषियों को फाँसी की सज़ा सुनायी तब एक आरोपी को नाबालिग मानते हुए तीन साल किशोर सुधार गृह में रहने की सजा दी गई अब हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में भी दोषियों को मिली फांसी की सजा पर मुहर लगी। इसके बाद भी काफी कानूनी प्रक्रिया चलती रही जिस वजह से इस मामले को अपने अंजाम तक पहुंचने में सात वर्ष से अधिक का समय लग गया और आज निर्भया को इंसाफ मिल गया | लेकिन अगर निर्भया केस के दोषियों को 2012 में ही फांसी मिल गई होती तो महिलाओं पर होने वाले अपराध शायद कम हो सकते थे। क़ानून का डर शायद अपराधियों को काबू में रखेगा।ख़ैर लेकिन सवाल आज भी वही है कब तक लड़कियों, महिलाओ,बच्चियों को ऐसे डर के साथ जीना होगा की कभी भी उनके साथ कुछ भी हो सकता है | और क्या निर्भया को इंसाफ मिलने में इतने साल लगने चाहिए थे यही वक़्त है कि भारत सरकार को ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स पर ध्यान देने की।